तीलियां घिसते घिसते थकीं उंगलियां
वर्त्तिका नींद से जाग पाई नही
शब्द दस्तक लगाते रहे द्वार पर
सुर ने कोई गज़ल गुनगुनाई नहीं
आपका है तकाजा रचूँ गीत मैं
चांदनी की धुली रश्मियों से लिखे
गीत कैसे लिखूं आप ही अब कहें
जब कि पायल कोई झनझनाई नहीं
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कुछ नये चित्र बनने लगे आँख में
कुछ नई गंध बसने लगी साँस में
कुछ नई आ मिली और अनुभूतियाँ
कुछ नये पंथ सजने लगे पाँव में
सोचने मैं लगा क्या अचानक हुआ
एक पाखी ने आ कर ये मुझसे कहा
कल जो सन्देश थी प्रीत लेकर गई
उसका उत्तर लिये आ रही है हवा
Friday, November 20, 2009
Tuesday, November 17, 2009
अंधियारे के जितने भी थे संबन्धी
दहलीजों ने भेजा जिनको कभी नहीं कोई आमंत्र
अंधियारे के जितने भी थे संबन्धी बन अतिथि आ गये
नभ ने गलियारों के परदे हटा किरण को पास बुलाया
लेकिन क्षितिजों पर से उमड़े बादल गहरे घने छा गये
अभिलाषा की हर कोंपल को बीन बहारें साथ ले गईं
जीवन की फुलवारी केवल बंजर की पहचान हो गई
यौवन की पहली सीढ़ी पर पूजा की अभिशापित लौ ने
झुलसायी आँखों में सँवरे सपनों की हर इक अँगड़ाई
सन्ध्या ने करील के झुरमुट में जितने भी दीपक टाँगे
उनसे दिशा प्राप्त करने में असफ़ल हो रह गई जुन्हाई
रजनी के आँचल में सिमटे अभिलाषा के निशा-पुष्प सब
और एक यह घटना जैसे पतझर को वरदान हो गई
जितनी भी रेखायें खींची, बनी सभी बाधायें पथ की
खड़ी हो गईं आ मोड़ों पर अवरोधों के फन फ़ैलाय
जीवन की गति को विराम दे गई शपथ वह एक अधूरी
जो गंगा के तट हमने ली थी हाथों में नीर उठाये
होठों पर की हँसी दिशायें बदल बदल आँखों तक पहुंची
और बही बन धारायें जो गज़लों का उन्वान हो गईं
अंधियारे के जितने भी थे संबन्धी बन अतिथि आ गये
नभ ने गलियारों के परदे हटा किरण को पास बुलाया
लेकिन क्षितिजों पर से उमड़े बादल गहरे घने छा गये
अभिलाषा की हर कोंपल को बीन बहारें साथ ले गईं
जीवन की फुलवारी केवल बंजर की पहचान हो गई
यौवन की पहली सीढ़ी पर पूजा की अभिशापित लौ ने
झुलसायी आँखों में सँवरे सपनों की हर इक अँगड़ाई
सन्ध्या ने करील के झुरमुट में जितने भी दीपक टाँगे
उनसे दिशा प्राप्त करने में असफ़ल हो रह गई जुन्हाई
रजनी के आँचल में सिमटे अभिलाषा के निशा-पुष्प सब
और एक यह घटना जैसे पतझर को वरदान हो गई
जितनी भी रेखायें खींची, बनी सभी बाधायें पथ की
खड़ी हो गईं आ मोड़ों पर अवरोधों के फन फ़ैलाय
जीवन की गति को विराम दे गई शपथ वह एक अधूरी
जो गंगा के तट हमने ली थी हाथों में नीर उठाये
होठों पर की हँसी दिशायें बदल बदल आँखों तक पहुंची
और बही बन धारायें जो गज़लों का उन्वान हो गईं
यह टेस्ट पोस्ट है!!
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ कोई गीत लिखूँ
इतिहासों में मिले न जैसी, ऐसी प्रीत लिखूँ
भुजपाशों की सिहरन का हो जहाँ न कोई मानी
अधर थरथरा कर कहते हो पल पल नई कहानी
नये नये आयामों को छू लूँ मैं नूतन लिख कर
कोई रीत न हो ऐसी जो हो जानी पहचानी
जो न अभी तक बजा, आज स्वर्णिम संगीत लिखूँ
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ मैं इक गीत लिखूँ
प्रीत रूक्मिणी की लिख डालूँ जिसे भुलाया जग ने
लिखूँ सुदामा ने खाईं जो साथ कॄष्ण के कसमें
कालिन्दी तट कुन्ज लिखूँ, मैं लिखूँ पुन: वॄन्दावन
और आज मैं सोच रहा हूँ डूब सूर के रस में
बाल कॄष्ण के कर से बिखरा जो नवनीत लिखूँ
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ मैं इक गीत लिखूँ
ओढ़ चाँदनी, पुरबा मन के आँगन में लहराये
फागुन खेतों में सावन की मल्हारों को गाये
लिखूँ नये अनुराग खनकती पनघट की गागर पर
लिखूँ कि चौपालों पर बाऊल, भोपा गीत सुनाये
चातक और पपीहे का बन कर मनमीत लिखूँ
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ मैं इक गीत लिखूँ
इतिहासों में मिले न जैसी, ऐसी प्रीत लिखूँ
भुजपाशों की सिहरन का हो जहाँ न कोई मानी
अधर थरथरा कर कहते हो पल पल नई कहानी
नये नये आयामों को छू लूँ मैं नूतन लिख कर
कोई रीत न हो ऐसी जो हो जानी पहचानी
जो न अभी तक बजा, आज स्वर्णिम संगीत लिखूँ
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ मैं इक गीत लिखूँ
प्रीत रूक्मिणी की लिख डालूँ जिसे भुलाया जग ने
लिखूँ सुदामा ने खाईं जो साथ कॄष्ण के कसमें
कालिन्दी तट कुन्ज लिखूँ, मैं लिखूँ पुन: वॄन्दावन
और आज मैं सोच रहा हूँ डूब सूर के रस में
बाल कॄष्ण के कर से बिखरा जो नवनीत लिखूँ
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ मैं इक गीत लिखूँ
ओढ़ चाँदनी, पुरबा मन के आँगन में लहराये
फागुन खेतों में सावन की मल्हारों को गाये
लिखूँ नये अनुराग खनकती पनघट की गागर पर
लिखूँ कि चौपालों पर बाऊल, भोपा गीत सुनाये
चातक और पपीहे का बन कर मनमीत लिखूँ
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ मैं इक गीत लिखूँ
Tuesday, November 10, 2009
सोच रहे हैं तुम कह दो
सोच रहे हैं तुम कह दो तो कोई गीत लिखें
और तुम्हें हम नहीं अपैरिचित, अपना मीत लिखें
लिखती नाम फूल की पांखुर पर रोजाना शबनम
जमना तट की रेती पर लिखता रहता है मधुबन
हम भी करते हुए अनुसरण ये ही रीत, लिखें
लिखता चन्दन पुरबाई के आँचल पर गन्धें
लहरें लिखतीं गंगा के तट पर आ सौगन्धें
तुम जो कह दो अनुबन्धों में लिपटी प्रीत लिखें
लिखती भोर धूप से लेकर किरणों की स्याही
कोयल स्वर की कूची लेकर रँगती अमराई
हम भी राधा की पायल से ले संगीत लिखें
सोच रहे हैं तुम कह दो तो...............................
और तुम्हें हम नहीं अपैरिचित, अपना मीत लिखें
लिखती नाम फूल की पांखुर पर रोजाना शबनम
जमना तट की रेती पर लिखता रहता है मधुबन
हम भी करते हुए अनुसरण ये ही रीत, लिखें
लिखता चन्दन पुरबाई के आँचल पर गन्धें
लहरें लिखतीं गंगा के तट पर आ सौगन्धें
तुम जो कह दो अनुबन्धों में लिपटी प्रीत लिखें
लिखती भोर धूप से लेकर किरणों की स्याही
कोयल स्वर की कूची लेकर रँगती अमराई
हम भी राधा की पायल से ले संगीत लिखें
सोच रहे हैं तुम कह दो तो...............................
Tuesday, November 03, 2009
पंख कटा कर रह जाते हैं
सांझ ढले घिरने लगती है आंखों में जब जब वीरानी
नैनीताली संदेशे जब खो जाते जाकर हल्द्वानी
संचित पत्रों के अक्षर जब धुंआ धुंआ हो रह जाते हैं
शेष न रहतीं गंधें उनमें जिन फूलों को किया निशानी
और टपकती है चन्दा से पीली सी बीमार रोशनी
आशाओं के पाखी अपने पंख कटा कर रह जाते हैं
दिन के पथ पर दिख पाता है कोई चिन्ह नहीं पांवों का
पगडंडी को विधवा करता है आभास तलक गांवों का
खत्म हो चुके पाथेयों की झोली भी छिनती हाथों से
जो चेहरा मिलता है, मिलता ओढ़े शून्यपत्र नामों का
छत को शीश ओढ़ लेने की अभिलाषाओं के सब जुगनू
उच्छवासों की गहरी आंधी में उड़ उड़ कर बह जाते हैं
जब संकल्प पूछने लगते प्रश्न स्वयं ही निष्ठाओं से
डांवाडोल आस्थाओं की जो विकल्प हों उन राहों से
पीढ़ी पीढ़ी मिली धरोहर भी जब बनती नहीं विरासत
लगता है कल्पों का बोझा जुड़ता है अशक्त कांधों से
असमंजस के पल सुरसा के मुख की तरह निरंतर बढ़ते
ढाढस के पल पवनपुत्र से बने सूक्ष्म ही रह जाते हैं
सूखी हुई नदी के तट का प्यास बुझाने का आश्वासन
सुधियों के दरवाजे को खड़काता है खोया अपनापन
आईने के बिम्ब धुंआसे, और धुंआसे हो जाते हैं
साथ निभाता नहीं संभल पाने का कोई भी संसाधन
तब हाथों से फ़िसल गये इक दर्पण की टूटी किरचों मे
सपने टुकड़े टुकड़े होकर अनायास ही ढह जाते हैं
नैनीताली संदेशे जब खो जाते जाकर हल्द्वानी
संचित पत्रों के अक्षर जब धुंआ धुंआ हो रह जाते हैं
शेष न रहतीं गंधें उनमें जिन फूलों को किया निशानी
और टपकती है चन्दा से पीली सी बीमार रोशनी
आशाओं के पाखी अपने पंख कटा कर रह जाते हैं
दिन के पथ पर दिख पाता है कोई चिन्ह नहीं पांवों का
पगडंडी को विधवा करता है आभास तलक गांवों का
खत्म हो चुके पाथेयों की झोली भी छिनती हाथों से
जो चेहरा मिलता है, मिलता ओढ़े शून्यपत्र नामों का
छत को शीश ओढ़ लेने की अभिलाषाओं के सब जुगनू
उच्छवासों की गहरी आंधी में उड़ उड़ कर बह जाते हैं
जब संकल्प पूछने लगते प्रश्न स्वयं ही निष्ठाओं से
डांवाडोल आस्थाओं की जो विकल्प हों उन राहों से
पीढ़ी पीढ़ी मिली धरोहर भी जब बनती नहीं विरासत
लगता है कल्पों का बोझा जुड़ता है अशक्त कांधों से
असमंजस के पल सुरसा के मुख की तरह निरंतर बढ़ते
ढाढस के पल पवनपुत्र से बने सूक्ष्म ही रह जाते हैं
सूखी हुई नदी के तट का प्यास बुझाने का आश्वासन
सुधियों के दरवाजे को खड़काता है खोया अपनापन
आईने के बिम्ब धुंआसे, और धुंआसे हो जाते हैं
साथ निभाता नहीं संभल पाने का कोई भी संसाधन
तब हाथों से फ़िसल गये इक दर्पण की टूटी किरचों मे
सपने टुकड़े टुकड़े होकर अनायास ही ढह जाते हैं
Wednesday, October 28, 2009
स्वप्न तुम्हारे आकर जब से चूम गये मेरी पलकों को
स्वप्न तुम्हारे आकर जब से चूम गये मेरी पलकों को
निंदिया के आँगन में तब से महकी है क्यारी गुलाब की
संध्या ने समेट ली थी जब बिछी हुई किरणों की चादर
यायावरी दिवस के पल सब लौटे थके, नीड़ को अपने
अम्बर ने लटका दीं विधु की विभा कमन्दें बना बना कर
आये उन पर उतर रात की अमराई से चल कर सपने
जो छू आये चित्र तुम्हारे वे आये मेरी खिड़की पर
दुहराते गाथायें सारी परी कथा वाली किताब की
धवल कपोतों के पंखों पर अटके हुए हवा के झोंके
रुक कर लगे देखने जितने चित्र पाटलों पर बन पाये
सपनों के गलियारे में जो चहलकदमियाँ किये जा रहे
चित्र तुम्हरे, से ले लेकर गीत प्रीत में भिगो सुनाये
जागी हुई हवायें तंद्रित होकर लगीं साथ में बहने
गंगा की धारा में लहरें उलझीं हैं आकर चिनाव की
चादर की सिकुड़न से करवट के जो मध्य रही है दूरी
सिमट गये कुछ चंचल सपने उसमें चुपके चुपके आकर
सांसो की कोमल सरगम पर अपना रंग चढ़ा कर गहरा
अलगोजा लग गये छेड़ने जल तरंग के साथ बजा कर
सरगम की स्वर लहरी पकड़े रहे झूमते सकल निशा में
बने लहर नभ की गंगा के धीमे से ठिठके बहाव की
आधी रात रात रानी के साथ महकता है जब बेला
तब उनकी अवगुंठित गंधों में थे डूबे और नहाये
अंतिम प्रहर रात का बरसा पिघल ओस की बून्दों में जब
तब हो उसमें सराबोर ये पलकों की कोरों पर आये
अलसाई अँगड़ाई के आँचल को थामे खड़े रहे हैं
छोड़ी नहीं किनारी पकड़ी नयनों पर बिछ गये लिहाफ़ की
निंदिया के आँगन में तब से महकी है क्यारी गुलाब की
संध्या ने समेट ली थी जब बिछी हुई किरणों की चादर
यायावरी दिवस के पल सब लौटे थके, नीड़ को अपने
अम्बर ने लटका दीं विधु की विभा कमन्दें बना बना कर
आये उन पर उतर रात की अमराई से चल कर सपने
जो छू आये चित्र तुम्हारे वे आये मेरी खिड़की पर
दुहराते गाथायें सारी परी कथा वाली किताब की
धवल कपोतों के पंखों पर अटके हुए हवा के झोंके
रुक कर लगे देखने जितने चित्र पाटलों पर बन पाये
सपनों के गलियारे में जो चहलकदमियाँ किये जा रहे
चित्र तुम्हरे, से ले लेकर गीत प्रीत में भिगो सुनाये
जागी हुई हवायें तंद्रित होकर लगीं साथ में बहने
गंगा की धारा में लहरें उलझीं हैं आकर चिनाव की
चादर की सिकुड़न से करवट के जो मध्य रही है दूरी
सिमट गये कुछ चंचल सपने उसमें चुपके चुपके आकर
सांसो की कोमल सरगम पर अपना रंग चढ़ा कर गहरा
अलगोजा लग गये छेड़ने जल तरंग के साथ बजा कर
सरगम की स्वर लहरी पकड़े रहे झूमते सकल निशा में
बने लहर नभ की गंगा के धीमे से ठिठके बहाव की
आधी रात रात रानी के साथ महकता है जब बेला
तब उनकी अवगुंठित गंधों में थे डूबे और नहाये
अंतिम प्रहर रात का बरसा पिघल ओस की बून्दों में जब
तब हो उसमें सराबोर ये पलकों की कोरों पर आये
अलसाई अँगड़ाई के आँचल को थामे खड़े रहे हैं
छोड़ी नहीं किनारी पकड़ी नयनों पर बिछ गये लिहाफ़ की
Monday, October 19, 2009
छलछला रह गया है जो, पानी लिखें
ज़िन्दगी के सफ़र में सपन बन गई पर अधूरी रही जो, कहानी लिखें
नैन के बाँध को तोड़ उमड़ा नहीं
छलछला रह गया है जो, पानी लिखें
पांव गतिमान थे साथ गति के सद
कोई मंज़िल नहीं, राह निस्सीम थ
एक पल को भी विश्राम दे न सकी
चाहना की उफ़नती रही थी नदी
उंगलियाँ तो बढ़ीं थीं क्षितिज थाम लें
किन्तु क्षमतायें बौनी हुई रह गईं
दी न स्वीकॄति कभी एक उस बात की
आईने की छवि जो कभी कह गई
जो छलावा बनी, बस लुभाती रही
पास आई नहीं, रुत सुहानी लिखें
आस के बीज बोये हुए, चुग गया
बन पखेरू समय, उम्र के मोड़ पर
कामना बन्धनों में बँधी रह गई
बढ़ नहीं पाई सीमाओं को तोड़कर
भाव मन के सभी थरथरा रह गये
शब्द में ढाल कर होठ कह न सके
आँधियाँ आ उड़ा ले गईं पास का
पल विफ़ल प्राप्ति के सिर्फ़ बह न सके
मान जिसको रखा अपनी परछाईं था
दुश्मनी उसने सीखी निभानी लिखें
पतझड़ी पत्र बन कर दिवस उड़ गये
नींद थी रात से वैर ठाने हुए
धूप के जितने टुकड़े गिरे गोद में
सावनी मेघ के थे वे छाने हुए
पंथ ने पी लिये थे दिशा बोध के
चिन्ह जो भी लगाये गये राह में
पथ खज़ूरों तले ही झुलसते रहे
छाँह का पल न आया तनिक बाँह में
पूरे दिन सुरमई रंग ओढ़े रहा
नभ हुआ ही नहीं आसमानी लिखें
नैन के बाँध को तोड़ उमड़ा नहीं
छलछला रह गया है जो, पानी लिखें
पांव गतिमान थे साथ गति के सद
कोई मंज़िल नहीं, राह निस्सीम थ
एक पल को भी विश्राम दे न सकी
चाहना की उफ़नती रही थी नदी
उंगलियाँ तो बढ़ीं थीं क्षितिज थाम लें
किन्तु क्षमतायें बौनी हुई रह गईं
दी न स्वीकॄति कभी एक उस बात की
आईने की छवि जो कभी कह गई
जो छलावा बनी, बस लुभाती रही
पास आई नहीं, रुत सुहानी लिखें
आस के बीज बोये हुए, चुग गया
बन पखेरू समय, उम्र के मोड़ पर
कामना बन्धनों में बँधी रह गई
बढ़ नहीं पाई सीमाओं को तोड़कर
भाव मन के सभी थरथरा रह गये
शब्द में ढाल कर होठ कह न सके
आँधियाँ आ उड़ा ले गईं पास का
पल विफ़ल प्राप्ति के सिर्फ़ बह न सके
मान जिसको रखा अपनी परछाईं था
दुश्मनी उसने सीखी निभानी लिखें
पतझड़ी पत्र बन कर दिवस उड़ गये
नींद थी रात से वैर ठाने हुए
धूप के जितने टुकड़े गिरे गोद में
सावनी मेघ के थे वे छाने हुए
पंथ ने पी लिये थे दिशा बोध के
चिन्ह जो भी लगाये गये राह में
पथ खज़ूरों तले ही झुलसते रहे
छाँह का पल न आया तनिक बाँह में
पूरे दिन सुरमई रंग ओढ़े रहा
नभ हुआ ही नहीं आसमानी लिखें
Friday, October 16, 2009
दीपमालिका अब ऐसी हो
जो चषक हाथ धन्वन्तरि के थमा, नीर उसका सदा आप पाते रहें
शारदा के करों में जो वीणा बजी, तान उसकी सदा गुनगुनाते रहें
क्षीर के सिन्धु में रक्त शतदल कमल पर विराजी हुई विष्णु की है प्रिया
के करों से बिखरते हुए गीत का आप आशीष हर रोज पाते रहें
-------------------------------------------------------------------------------
दीप दीपावली के जलें इस बरस
यूँ जलें फिर न आकर अँधेरा घिरे
बूटियाँ बन टँगें रात की ओढ़नी
चाँद बन कर सदा जगमगाते रहें
तीलियाँ हाथ में आ मशालें बनें
औ तिमिर पाप का क्षीण होता रहे
होंठ पर शब्द जयघोष बन कर रहें
और ब्रह्मांड सातों गुँजाते रहें
दांव तो खेलती है अमावस सदा
राहु के केतु के साथ षड़यंत्र कर
और अदॄश्य से श्याम विवरों तले
है अँधेरा घना भर रही सींच कर
द्दॄष्टि के क्षेत्र से अपनी नजरें चुरा
करती घुसपैठ है दोपहर की गली
बाँध कर पट्टियां अपने नयनों खड़ी
सूर समझे सभी को हुई मनचली
उस अमावस की रग रग में नूतन दिया
इस दिवाली में आओ जला कर धरें
रश्मियां जिसकी रंग इसको पूनम करें
पांव से सर सभी झिलमिलाते रहें
रेख सीमाओं की युग रहा खींचत
आज की ये नहीं कुछ नई बात हैअ
और सीमायें, सीमाओं से बढ़ गईं
जानते हैं सभी, सबको आभास है
ये कुहासों में लिपट हुए दायरे
जाति के धर्म के देश के काल के
एक गहरा कलुष बन लगे हैं हुए
सभ्यता के चमकते हुए भाल पे
ज्योति की कूचियों से कुहासा मिटा
तोड़ दें बन्द यूँ सारे रेखाओं के
पीढ़ियों के सपन आँख में आँज कर
होंठ नव गीत बस गुनगुनाते रहें
भोजपत्रों पे लिक्खी हुई संस्कॄति
का नहीं मोल कौड़ी बराबर रहा
लोभ लिप्सा लिये स्वार्थ हो दैत्य सा
ज़िन्दगी भोर से सांझ तक डँस रहा
कामनायें न ले पाई सन्यास है
लालसा और ज्यादा बढ़ी जा रही
देव के होम की शुभ्र अँगनाई में
बस अराजकता होकर खड़ी गा रही
आओ नवदीप की ज्योति की चेतना
का लिये खड्ग इनका हनन हम करें
और बौरायें अमराईयाँ फिर नई
गंधमय हो मरुत सरसराते रहें
शारदा के करों में जो वीणा बजी, तान उसकी सदा गुनगुनाते रहें
क्षीर के सिन्धु में रक्त शतदल कमल पर विराजी हुई विष्णु की है प्रिया
के करों से बिखरते हुए गीत का आप आशीष हर रोज पाते रहें
-------------------------------------------------------------------------------
दीप दीपावली के जलें इस बरस
यूँ जलें फिर न आकर अँधेरा घिरे
बूटियाँ बन टँगें रात की ओढ़नी
चाँद बन कर सदा जगमगाते रहें
तीलियाँ हाथ में आ मशालें बनें
औ तिमिर पाप का क्षीण होता रहे
होंठ पर शब्द जयघोष बन कर रहें
और ब्रह्मांड सातों गुँजाते रहें
दांव तो खेलती है अमावस सदा
राहु के केतु के साथ षड़यंत्र कर
और अदॄश्य से श्याम विवरों तले
है अँधेरा घना भर रही सींच कर
द्दॄष्टि के क्षेत्र से अपनी नजरें चुरा
करती घुसपैठ है दोपहर की गली
बाँध कर पट्टियां अपने नयनों खड़ी
सूर समझे सभी को हुई मनचली
उस अमावस की रग रग में नूतन दिया
इस दिवाली में आओ जला कर धरें
रश्मियां जिसकी रंग इसको पूनम करें
पांव से सर सभी झिलमिलाते रहें
रेख सीमाओं की युग रहा खींचत
आज की ये नहीं कुछ नई बात हैअ
और सीमायें, सीमाओं से बढ़ गईं
जानते हैं सभी, सबको आभास है
ये कुहासों में लिपट हुए दायरे
जाति के धर्म के देश के काल के
एक गहरा कलुष बन लगे हैं हुए
सभ्यता के चमकते हुए भाल पे
ज्योति की कूचियों से कुहासा मिटा
तोड़ दें बन्द यूँ सारे रेखाओं के
पीढ़ियों के सपन आँख में आँज कर
होंठ नव गीत बस गुनगुनाते रहें
भोजपत्रों पे लिक्खी हुई संस्कॄति
का नहीं मोल कौड़ी बराबर रहा
लोभ लिप्सा लिये स्वार्थ हो दैत्य सा
ज़िन्दगी भोर से सांझ तक डँस रहा
कामनायें न ले पाई सन्यास है
लालसा और ज्यादा बढ़ी जा रही
देव के होम की शुभ्र अँगनाई में
बस अराजकता होकर खड़ी गा रही
आओ नवदीप की ज्योति की चेतना
का लिये खड्ग इनका हनन हम करें
और बौरायें अमराईयाँ फिर नई
गंधमय हो मरुत सरसराते रहें
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